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सूरदास

“हरष आनंद बढ़ावत हरि अपनैं आंगन कछु गावत | तनक तनक चरनन सों नाच मन हीं मनहिं रिझावत || बांह उठाई कारी धौरी गैयनि टेरी बुलावत | कबहुंक बाबा नंद पुकारत कबहुंक घर आवत || माखन तनक आपनैं कर लै तनक बदन में नावत | कबहुं चितै प्रतिबिंब खंभ मैं लोनी लिए खवावत || दूरि देखति जसुमति यह लीला हरष आनंद बढ़ावत | सुर स्याम के बाल चरित नित नितही देखत भावत ||”

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